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इंडोनेशिया में सुरीली नमाज

२६ जुलाई २०१२

इंडोनेशिया में मस्जिदों को लाउडस्पीकर युद्ध से बाहर निकालने की कोशिश हो रही है. रमजान के महीने में नमाज को सुरीला बनाने के लिए अच्छे स्पीकर लगाये जा रहे हैं ताकि भक्तिभाव भरे और गैर मुस्लिमों को भी परेशानी न हो.

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तस्वीर: picture-alliance/dpa

दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलमान इंडोनेशिया में रहते हैं. देश में करीब आठ लाख मस्जिदें हैं. ज्यादातर मस्जिदों में अब तक पुराने और बहुत कर्कश आवाज में शोर करने वाले स्पीकर लगे हुए थे. कई स्पीकरों को आपस में बढ़िया ढंग से ट्यून भी नहीं किया गया है. इनके ऊपर मस्जिदों के बीच की प्रतिद्वंद्विता.

देश में मुसलमानों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था इंडोनेशियन उलेमा काउंसिल अमिदहान के मुताबिक, "एक शिकायत यह है कि जब एक ही इलाके में दो या तीन मस्जिदें होती हैं तो वे सभी लाउडस्पीकर युद्ध में शामिल हो जाती हैं. वे दूसरे से ज्यादा तेज आवाज निकालने की कोशिश करती हैं."

इसकी वजह से कई दिशाओं से आता तेज शोर लोगों को परेशान करता है. जकार्ता पोस्ट अखबार के लिए लिखे एक लेख में रोसी कामेओ कहते हैं, "अगर एक ऊंची आवाज दिन में पांच बार 5-10 मिनट चले तो हमें कोई शिकायत नहीं है. लेकिन अगर हमारे आस पास पांच मस्जिदें अलग अलग समय में अजान शुरू करें और यह 30-45 मिनट चले तो शोर बहरा कर देता है."

इंडोनेशियन उलेमा काउंसिल ने इस समस्या को कम करने की दिशा में कदम उठाया है. कई मस्जिदों में अब सुरीले और बेहतर क्वालिटी के स्पीकर लगाए जा रहे हैं. स्थानीय स्पीकर कंपनी वी8 को इस कदम में मुनाफा दिख रहा है. उनके अल करीम स्पीकरों की बाजार में मांग बढ़ गई है.

Frauen aus Indonesien
तस्वीर: AP

कंपनी के संस्थापक हैरी किसवोतो कहते हैं, "इन लाउडस्पीकरों का मकसद है कि इंडोनेशिया की मस्जिदें जैज लाउंज जैसा माहौल बना सकें." ज्यादातर मस्जिदें इन अल करीम स्पीकरों को खरीदने के लिए 2.5 करोड़ इंडोनेशियाई रुपये खर्च करने को तैयार हैं. आम स्पीकर की तुलना में यह कीमत दोगुनी है.

लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल दिन में पांच बार अजान देने के लिए होता है. सूर्योदय से पहले फज्र की नमाज होती है. उसके लिए तड़के अजान दी जाती है. विश्लेषकों के मुताबिक इंडोनेशिया में धीरे धीरे धार्मिक भावना बढ़ती जा रही है. बड़े शहरों में पहले से ज्यादा महिलाएं हिजाब पहने हुए दिखती हैं. इस माहौल से अन्य समुदाय के लोगों को कुछ आशंकाएं भी हो रही हैं. अन्य समुदायों के संगठनों के मुताबिक देश में सहनशीलता कम होती जा रही है.

ओएसजे/एमजे (रॉयटर्स)

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