1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें

गांधी से अन्ना हजारे तक

२२ अप्रैल २०११

गांधी, गांधी टोपी वाले अन्ना, आर्थिक चमत्कार, भ्रष्टाचार और लोकतंत्र. भारत के बारे में जर्मन प्रेस की रिपोर्टिंग इन दिनों इन्हीं मसलों के इर्दगिर्द हो रही है.

https://p.dw.com/p/112d6
अन्ना हजारे को मिला व्यापक समर्थनतस्वीर: dapd

मिसाल के तौर पर नोय त्स्युरिषर त्साइटुंग में गांधी की नई जीवनी पर छिड़े विवाद का जिक्र करते हुए ध्यान दिलाया गया है कि गुजरात विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित एक प्रस्ताव के जरिए इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. समाचार पत्र की राय में इस मामले में बेवजह उन्माद देखा जा सकता है. अखबार में कहा गया है:

इस जीवनी के लेखक और न्यूयार्क टाइम्स के पूर्व पत्रकार जोसेफ लेलीवेल्ड ने पूरी कोशिश की है कि इस तूफान को रोका जाए. वे कहते हैं, "इस किताब में कतई नहीं कहा गया है कि गांधीजी समलैंगिक या बाईसेक्सुएल थे. इसमें कहा गया है कि वह ब्रह्मचारी का जीवन जीते थे और उन्हें कालेनबाख से बेहद लगाव था." उन्हें इस बात पर अचरज है कि एक लोकतंत्र में किसी किताब को पढ़े बिना उस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है. उन्हें यह बात भी मार्के की लगी कि यौन संकेतों के बिना पुरुषों के बीच दोस्ती की बात नहीं कही जा सकती है.

इस किताब के सिलसिले में सिविल सोसायटी की प्रतिक्रिया के बारे में समाचार पत्र की रिपोर्ट में कहा गया है :

किताब अभी बाजार में आई भी नहीं थी कि उस पर प्रतिक्रिया शुरू हो गई, जिसका मुख्य सुर यह था कि स्कैंडल का स्रोत यह किताब नहीं है, बल्कि उस पर प्रतिबंध. पलटवार करते हुए कॉलम लेखिका शोभा डे ने टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था, "महात्मा एक समलैंगिक संत? आखिर क्यों नहीं ?"

Indien Hungerstreik von Aktivist Anna Hazare gegen Korruption in New Delhi
गांधी के सिद्धातों के सहारे भ्रष्टाचार से जंगतस्वीर: dapd

समाचार पत्र फ्रांकफुर्टर रुंडशाउ में भी इस किताब के बारे में टिप्पणी की गई है. समाचार पत्र में कहा गया है कि गांधी के देश भारत में यह आरोप लगाया जाता है कि पश्चिम में कुछ तत्वों की गांधी के यौन जीवन में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी है. समाचार पत्र की राय में यह सच है कि अंग्रेजी के कुछ अंतरराष्ट्रीय समाचार साधनों में लेलीवेल्ड की किताब से कुछ ललचाने वाले तथ्यों को छांटकर उन्हें खूब उछाला गया. रिपोर्ट में कहा गया है :

भारत में इसे हद से बाहर माना गया. आखिरकार गांधी के नेतृत्व में 1947 में भारत को आजादी मिली थी और आज भी भारत में उन्हें देवता की तरह माना जाता है. इस सवाल का कभी कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलेगा कि क्या गांधी और कालेनबाख के बीच सिर्फ दोस्ती थी ? आखिर गांधी ने कालेनबाख की चिट्ठियों को फाड़कर फेंक दिया था, और अब सिर्फ कालेनबाख को लिखी गई गांधी की चिट्ठियां ही मौजूद हैं. लेकिन शुचिवादी भारत में एक सवाल को टाला जा रहा है : अगर गांधी को पुरुषों से भी लगाव था, तो इसमें कौन सी बुराई है ? हालांकि अब भारत में समलैंगिकता को अपराध नहीं माना जा रहा है और यह व्यापक रूप से फैली हुई है, लेकिन सामाजिक रूप से यह वर्जित है. गांधी के वारिस इस मामले में काफी संतुलित रुख अपना रहे हैं. उनके एक पोते ने कहा है कि किताब पर प्रतिबंध लगाने का कोई आधार नहीं है.

समाचार पत्र बर्लिनर त्साइटुंग में कहा गया है कि देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद भारत के करोड़ों नागरिक इस बीच उपभोक्तावाद की धार में इस कदर बह रहे हैं कि गांधी के त्याग के बदले महाराजाओं का भोग उनका आदर्श लगता है. आगे कहा गया है :

लेकिन अन्ना हजारे की मिसाल से स्पष्ट हो जाता है कि गांधी के विचार आज भी भारत में जीवंत हैं. आम जनता की भीड़ से ऊपर उठने के लिए दृढप्रतिज्ञता जरूरी थी. जैसा कि जोसेफ लेलीवेल्ड की जीवनी में प्रस्तुत किए गए तथ्यों से स्पष्ट है, स्वतंत्रता संग्राम के नेता, जिनको भारत में आज लगभग देवता की तरह पूजा जाता है, सिर्फ एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी ही नहीं थे. वे किसी संत से कहीं ज्यादा थे.

Flash-Galerie Supermacht Indien - 60 Jahre demokratische Verfassung
गांधी में कुछ लोगों की ज्यादा ही दिलचस्पी है और इसी से विवाद भी पैदा होते हैंतस्वीर: AP

गांधी के बाद गांधी टोपी. म्युनिख से प्रकाशित दैनिक जुएडडॉएचे त्साइटुंग में अन्ना हजारे की गांधी टोपी की ओर इशारा करते हुए दोनों के बीच समानताओं की ओर ध्यान दिलाया गया है. एक लेख में कहा गया है :

हजारे देखने में तो सीधे लगते हैं, लेकिन वे एक सधे हुए रणनीतिकार हैं. वह इंतजार करते रहे कि विश्व कप क्रिकेट में भारत की जीत का जश्न खत्म हो, और उसके बाद दो हफ्ता पहले वह राजधानी दिल्ली के बीचोबीच भूख हड़ताल पर बैठ गए. उनका हिसाब सही निकला. उनके विरोध से सार्वजनिक लोकमत के बीच मानो बिजली सी दौड़ गई. चार दिनों के अनशन के बाद सरकार के पास उन्हें गले लगाने के अलावा कोई चारा न बचा. हजारे को प्रस्ताव दिया गया कि अगर वह अपना अभियान खत्म करते हैं, तो वह भ्रष्टाचार के खिलाफ विधेयक के निर्माण में हाथ बंटा सकते हैं. इस मामले में कानून की काफी समय से जरूरत है. हालांकि करोड़ों भारतीय आज भी गरीबी में जी रहे हैं, उनकी कोई आवाज नहीं है, लेकिन लगातार बढ़ता हुआ एक मध्यवर्ग सामने आ चुका है, और वह सत्ताधारियों से हिसाब की मांग कर रहा है.

और इसी अखबार के एक अन्य लेख में ध्यान दिलाया गया है कि ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की ओर से प्रकाशित भ्रष्टाचार की सूची में 187 देशों के बीच भारत का 87वां स्थान है.

संकलन: प्रिया एसेलबॉर्न/उभ

संपादन: ए कुमार

इस विषय पर और जानकारी को स्किप करें

इस विषय पर और जानकारी