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गर्भपात से भारत में घटती लड़कियां

२४ मई २०११

भारत में अब भी ज्यादातर परिवार चाहते हैं कि उनके घर में लड़का पैदा हो. एक नए शोध से पता चला है कि लिंग निर्धारण के बाद हुए गर्भपातों के कारण पिछले दशक में जन्मी लड़कियों की संख्या 70 लाख कम रही.

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तस्वीर: picture alliance/Dinodia Photo Library

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लैंसेट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक जिन परिवारों में पहला बच्चा लड़की हुई और अल्ट्रासाउंड में उन्हें पता चला कि दूसरा बच्चा भी लड़की है तो उसे गर्भ में ही मार दिया जाता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि गरीब परिवारों के मुकाबले समृद्ध परिवारों में इस तरह लिंग आधारित गर्भपात ज्यादा होते हैं. आम तौर पर गरीब गर्भपात से पहले होने वाले टेस्ट कराने के काबिल नहीं होते.

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तस्वीर: UNI

1980 से लेकर 2010 के बीच एक करोड़ 20 लाख भ्रूणों की हत्या की गई. शोध में कहा गया है, "कन्या भ्रूण का पता लगने के बाद ही ज्यादातर मामलों में गर्भपात किया गया है, खासकर उन परिवारों में जहां पहले लड़की हुई है. इस वजह से लड़के और लड़कियों की संख्या में भारी फर्क आया है." 1991 में छह साल तक की उम्र के बच्चों में लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले 40 लाख कम थी. 2001 में यह संख्या बढ़कर 60 लाख हो गई.

2008 में जन्म दर प्रति महिला करीब 2.6 आंकी गई. 1990 में यह आंकड़ा 3.8 था. शोधकर्ताओं का मानना है कि जन्म दर घटने के साथ साथ अगर परिवार लड़के पैदा होते देखना चाहते हैं, तो इससे लड़कियों की संख्या पर भी असर होता है. सालाना तीन से लेकर छह लाख कन्या भ्रूणों को मार दिया जाता है. 2010 में लगभग एक करोड़ 35 लाख महिलाओं के गर्भ में लड़कियां थीं. इनमें से दो से लेकर चार प्रतिशत महिलाओं ने गर्भपात कराया. 2001 से 2011 के बीच कन्या भ्रूणों पता लगने के बाद गर्भपात 170 प्रतिशत के दर से बढ़ा है. लेकिन अच्छी बात यह है कि यह 1991 से 2011 के दशक में 260 प्रतिशत के दर से काफी कम रहा.

शोध में 2011 की जनगणना से जानकारी ली गई है और पूरे देश से लगभग दो लाख 50,000 जन्मों को देखा गया. इन सब परिवारों में पहले लड़की पैदा हुई. इसमें पता चला कि 1990 में हर 1000 लड़कों पर 906 लड़कियां थीं जबकि 2005 में लड़कियों की संख्या घटकर 836 हो गई. शोध से पता चला कि जिन परिवारों में पहले लड़का हुआ, उन्हें बाद में लड़की पैदा होने पर गर्भपात करने की जरूरत महसूस नहीं हुई.

भारत में पहला बच्चा लड़की होने पर गर्भपात करने के सबूत भी साफ नहीं हैं. भारत में 1963 में भ्रूण के लिंग निर्धारण पर पाबंदी लगाई गई थी. लेकिन इस कानून को तोड़कर सैंकड़ों परिवारों ने लड़का पैदा करने की अपनी तमन्ना को पूरा किया गया है. शोधकर्ता कहते हैं कि कानून तोड़ने से डॉक्टरों को बहुत कम सजा का सामना करना पड़ता है और यह पैसा कमाने का अच्छा जरिया है.

रिपोर्टः एएफपी/एमजी

संपादनः ए कुमार