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ब्लैक डेथ ने क्यों मचाया था तांडव?

१४ अक्टूबर २०११

लंदन की कब्रिस्तान से मध्यकालीन शवों से निकाले गए प्लेग रोगाणु से पता चलता है कि ब्लैक डेथ के लिए जिम्मेदार जीवाणु इंसान के लिए घातक क्यों साबित हुए, और ब्लैक डेथ के बाद महामारी का सिलसिला क्यों जारी है.

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इंसान की दुश्मन महामारीतस्वीर: AP

ब्रिटिश पत्रिका नेचर में छपे एक अध्ययन से पता चलता है कि 14वीं शताब्दी के लोगों में रोगाणु से लड़ने की क्षमता नहीं थी. 14वीं शताब्दी में ब्लैक डेथ यानी प्लेग से यूरोप में लाखों लोग मारे गए थे. विकासवादी संदर्भ में यरसिनिया पेस्टिस का डीएनए बताता है कि वह काफी सफल जीवाणु था.

शोध से पता चलता है कि पिछली 6 सदियों में इस रोगाणु में कोई बदलाव नहीं हुआ है. जर्मनी की टुइबिंगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और शोधकर्ता योहानेस क्राउजे कहते हैं,  "मानव इतिहास में ब्लैक डेथ पहली प्लेग महामारी थी. मनुष्य भोले भाले थे और इस रोग का सामना करने के लिए सक्षम नहीं थे."

Flash-Galerie Haiti Cholera
तस्वीर: AP

खतरनाक महामारी

मानव इतिहास में किसी अन्य वायरस या बग ने उतनी जनसंख्या का सफाया नहीं किया है, जितना ब्लैक डेथ ने. चीन से यूरोप आई इस महामारी ने 1347 से 1351 तक तांडव मचाया जिसमें यूरोप की 3 करोड़  आबादी खत्म हो गई.

क्राउजे कहते हैं, "फिर से रचे गए जिनोम के आधार पर हम यह कह सकते हैं मध्यकालीन प्लेग सभी प्रकार के आधुनिक मानव पैथोजेनिक प्लेग की जड़ है."  क्राउजे कहते हैं कि अमेरिकी रेड इंडियंस को हमेशा चेचक का खतरा रहता था जबकि यूरोपीय लोगों को कभी नहीं रहा. क्राउजे के मुताबिक, "जो लोग परिवर्तन के कारण कम अतिसंवेदनशील थे वो शायद बच गए.  और यह फायदेमंद तब्दीली शायद फैल गई हो." ऐसी संभावना है कि सामाजिक परिस्थितियों के कारण ब्लैक डेथ ज्यादा जानलेवा साबित हुआ होगा.

जारी है महामारी

18वीं और 19वीं सदी की तुलना में उस समय की स्थिति बहुत खराब थीं. गरीबी और कुपोषण का बोलबाला था. साफ सफाई की अवधारणा ही नहीं थी. मानव इतिहास में प्लेग, हैजा, टीबी, फ्लू, टाइफॉयड, चेचक, मलेरिया आदि बीमारियां कभी न कभी महामारी के रूप में पूरी दुनिया में दहशत फैला चुकी हैं.

430 ईसा पूर्व में एथेंस में  फैले टाइफॉयड से एक चौथाई आबादी खत्म हो गई थी. यह बुखार मरीज को किसी दूसरे व्यक्ति को संक्रमित करने से पहले ही मार डालता था.19 वीं शताब्दी में चीन और भारत में प्लेग ने महामारी का रूप लिया. अकेले भारत में ही इसने एक करोड़ लोगों की जान ली.


रिपोर्ट: एएफपी/आमिर अंसारी

संपादन: महेश झा

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